जानिए NIA को पहचान दिलाने वाले IPS संजीव सिंह कौन थे

राष्ट्रीय अनुसंधान एजेंसी (National Investigation Agency) यानी एनआईए के पहले आईजी संजीव कुमार सिंह (Sanjeev Kumar Singh) का ताल्लुक बिहार (Bihar) के समस्तीपुर से था, लेकिन वो मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) कैडर के 1987 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे. बीते शुक्रवार को गुड़गांव के एक अस्पताल में डेंगू (Dengue) से जंग हार जाने वाले सिंह को इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि उन्होंने देश ही नहीं बल्कि दुनिया में आतंक के खिलाफ लड़ने वाली (Anti Terror Agency) अपनी तरह की पहली संस्था को आकार और पहचान दिलाने में भरपूर और भरसक कोशिशें कीं.

जनवरी 2009 में जब सिंह ने एनआईए जॉइन किया था, तब उन्हें पहले प्रोजेक्ट के तौर पर मुंबई के 26/11 हमले के दोषियों को बेनकाब करने का ज़िम्मा सौंपा गया था. दिसंबर 2011 में जो चार्जशीट फाइल की गई, उसमें कहा गया कि ​मुंबई हमले में पाकिस्तान में आर्मी अफसर रह चुके दो लोगों का सीधा हाथ था. अपनी काबिलियत और नए प्रयोगों से सिंह ने तारीफ पाई तो एनआईए ने पहचान. 61 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले आईपीएस सिंह को जानिए.

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ईमेल ट्रैकिंग का पहली बार प्रयोगमुंबई हमले की गुत्थी को सुलझाने के लिए सिंह ने पहली इस तकनीक समेत कई एडवांस्ड सॉफ्टवेयरों की मदद ली थी और भारत में इस भीषण आतंकी हमले में पाक के आर्मी अफसरों की भूमिका को साबित किया था. हॉटमेल, माइक्रोसॉफ्ट के साथ ही अमेरिका के न्याय विभाग की मदद लेकर सिंह के कार्यकाल में एनआईए ने इस केस को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाया. जांच इतिहास में ऐसा पहले नहीं हुआ था.

वरिष्ठ पुलिस अफसर जीपी सिंह ने संजीव सिंह के निधन की खबर ट्विटर पर साझा की.

किसी आतंकी केस में फाइल की गई सबसे बेहतरीन जांच रिपोर्ट्स में सिंह और उनकी टीम द्वारा तैयार और फाइल की गई इस केस की चार्जशीट को शुमार यिका जाता है, जिसमें मिनट डिटेल्स तक थे. साइबर ट्रैकिंग सहित ऐसे कई पैमाने इस केस की जांच ने तय किए, जो आधुनिक जांच तकनीक के आधार माने गए.

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कभी दिलेरी, कभी तरकीब
अपनी प्रोफेशनल हदों को समझते हुए सिंह को ये पता था कि काम कैसे और किस सूत्र से करना होता है. उदाहरण के तौर पर डीएसपी रहते हुए जब उन्हें एक संदिग्ध आतंकी के कॉल डिटेल्स की अर्जेंट ज़रूरत थी, तब उन्होंने अपने बर्ताव से टेलिकॉम कंपनी के अधिकारियों का दिल जीतकर कुछ ही देर में सब रिकॉर्ड्स निकलवा लिये थे. दूसरी तरफ, मौके पर दिलेरी दिखाने से भी पीछे नहीं ​हटते थे. ऐसा ही एक किस्सा तब का है, जब 2011 में एक लड़की डूब रही थी और सिंह ने अपनी कार से सीधे पानी में छलांग लगाकर उसे बचाया था.

मंत्री के बेटे की पिटाई का किस्सा
भोपाल में 1996 से 97 के बीच एसपी रहते हुए सिंह ने तत्कालीन मंत्री के बेटे की पिटाई सार्वजनिक रूप से की थी क्योंकि वह एक लड़की के खिलाफ भद्दे कमेंट यानी ईव टीज़िंग कर रहा था. उस वक्त सिंह को यह पता था कि वो लड़का कौन था, उसके बावजूद उन्होंने उसे सबक सिखाने से परहेज़ नहीं किया था. इस किस्से की गूंज काफी समय तक भोपाल और मप्र के सियासी व प्रशासनिक गलियारों में रही थी.

हाई प्रोफाइल केस और सिंह
अक्टूबर 2013 में जब नरेंद्र मोदी पटना के गांधी मैदान में भाषण दे रहे थे, तब वहां हुए बम धमाके के हाई प्रोफाइल केस की जांच सिंह ने संभाली थी. जुलाई 2013 में बोधगया बमकांड की गुत्थी भी सिंह ने सुलझाई थी. इसके अलावा, 25 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतारने वाले नक्सली हमले यानी झीरम घाटी नरसंहार कांड की जांच भी सिंह के नेतृत्व में ही हुई.

सिंह के बारे में विशेष लेख प्रकाशित करने वाली संडे गार्जियन पत्रिका ने यह भी लिखा है कि उन पर कई बार राजनीतिक दबाव रहा कि जांच किसी एक दिशा में की जाए लेकिन फैक्ट्स के आधार पर ईमानदार जांच करने में सिंह कभी पीछे नहीं हटे.

जनवरी 2016 में पठानकोट आतंकी हमले और 2014 के बुर्दवान धमाके के केस की हाई प्रोफाइल जांच भी सिंह के ही मार्गदर्शन में हुई. सबसे लंबे समय तक एनआईए में सेवा देने के रिकॉर्ड समेत तमाम उप​लब्धियों के बावजूद क्यों सिंह को 2016 में उनके होम कैडर में ट्रांसफर कर दिया गया था? जबकि ​उस वक्त सिंह को एक साल का एक्सटेंशन मिले हुए दो महीने भी नहीं हुए थे!

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एनआई के सूत्रों के हवाले से गार्जियन ने लिखा है कि 10 अगस्त 2016 को सिंह ने लश्कर ए तैयबा के आतंकी बहादुर अली के ऑडियो वीडियो का खुलासा प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर दिया था, जिससे कई बड़े अधिकारी जोखिम महसूस कर रहे थे.

व्यक्ति के तौर पर कैसे थे सिंह?
अपने जूनियरों के साथ गर्मजोशी और हंसी मज़ाक करने वाले और ज़रूरत पड़ने पर सबकी मदद करने वाले अफसर की छवि रखते हुए सिंह को बढ़ती उम्र में भी आराम नहीं बल्कि काम ही करना पसंद था. बीएसफ में पोस्टिंग रही, मप्र में नक्सल ऑपरेशन के एडीजी रहे और उन्होंने एनएससी में भारत की रणनीतिक ज़रूरतों के लिए कई नीतियां बनवाने में अहम रोल निभाया.

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